Skip to main content

Posts

Showing posts with the label कबीर के दोहे

कबीर के दोहे - पद-1 एवं पद-2 || कक्षा - 11 || दोहा का भावार्थ

पद 1 हम तौ एक एक करी जांनां । दोई कहैं तिनहीं कौं दोजग जिन नाहिन पाहिचांनां ॥   अर्थ:- हम तो उस एक (ईश्वर) को एक ही जानते हैं।  जो उस एक (ईश्वर) को नहीं पहचानते हैं या उसे दो मानते हैं उसे नरक मिलता है।   भावार्थ:- कबीरदास जी कहते हैं कि वे सिर्फ एक ही ईश्वर को जानते हैं । वे लोगों की इस धारणा को खारिज करते हैं कि इस संसार में अनेक ईश्वर हैं। वे कहते हैं कि जो लोग यह समझते हैं कि एक से अधिक ईश्वर हैं वे नरक में जाएंगे क्योंकि उन्हे ज्ञात ही नहीं है कि पूरे संसार में एक ही ईश्वर हैं, यद्यपि   उनके अनेक रूप हैं।     एकै पावन एक ही पानीं एकै जोति समांनां । एकै खाक गढ़े सब भांड़ै एकै कोंहरा सांनां ॥  अर्थ :- एक ही पवन, एक ही पानी और एक ही ज्योति है जो पूरे विश्व में व्याप्त है, ठीक वैसे की पूरे ब्रह्मांड में एक ही ईश्वर है। कुम्हार भी एक ही मिट्टी को सानकर या मिलकर विभिन्न तरह के बर्तन बनाता है, ठीक उसी तरह हम सभी एक ही मिट्टी के बने हैं।    भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जिस तरह पूरे विश्व में एक ही हवा है, एक ही जल है और सूर्य का प...